गीत नया एक गाऊगा (Geet Naya Ek Gauga)

कल तक मैंने जो,
अपनी ही रचनाओं को,
साज संभाल रखा था,
अपने खुद की गठरी में,
घूम रही थी इधर उधर ,
उस बंद लिफाफे में,
एक पैकेट बनकर,
आज जो उस पर से,
झटक रहा हु धूल घनी,
सोच रहा हु क्या होगा,
इनका आगे,
जो कभी तुम्हारे लिए थी बनी,
घेर लिया है तुमने मुझको,
अपनी यादों के साये में,
कुछ खट्टी मीठी यादें देकर,
चली गई थी,
कुछ तीखे से बाण चले थे,
मेरे मन में,
कर के वो आघात गए थे,
फिर भी जीवन ने समझाया,
सपनो का संसार अनोखा,
जो पल बिता था संग संग,
वो अपना था,
बाकी सब था,
उस एक समय का धोखा,
इन सब यादों और बातों को,
पीछे कर के,
जीवन का अब सारा में सार समेटे,
यही से आगे बढ़ तो रहा हूँ,
नए भविष्य को जोड़ जोड़ कर,
कथा कहानी गढ़ तो रहा हूँ,
एक सोच ये मेरे मन में अब आई है,
जो बीता हैं उस पर ना कुछ बात करुगा,
नए हैं किस्से नई कहानी,
नए मिले हैं मुझको,
ये सारे रिश्ते नाते अब,
इन पर ना आघात करुगा,
कल का मेरे कल पर ना,
कुछ बाकी होगा,
नया समय जो बदल रहा है,
मेरे कल पर ना हावी होगा,
मैं अपनी रचनाओं में ही,
जीवन जीता जाउगा,
ये मेरी अपनी दुनिया हैं,
जिसमे अब मैं सिमटा हूँ,
फिर अपनी रचनाओं से में,
गीत नया एक गाऊगा।

© Devershi Mehta “Jugnu”

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पुरा पुरा चाँद हैं आज आसमान में

पुरा पुरा चाँद हैं, आज आसमान में,
आजा पिया तुझको देखु जी भर के,
इस चाँद की नुमाइश में, लम्हे की फरमाइश हैं,
भीनी भीनी चाँदनी का आज आभास हैं,
निगहबां जो तू हैं उस चाँद को बता,
पुरा पुरा चाँद हैं, आज आसमान में,
आजा पिया तुझको देखु जी भर के,

वो चाँद जो बादलों में छुप रहा हैं,
मेरा चाँद मेरी तरफ रुख कर रहा हैं,
इस चाँदनी रात में,
प्यार की सौगात ले,
महकी हुई चाँदनी की आज महकांस हैं।
पुरा पुरा चाँद हैं, आज आसमान में,
आजा पिया तुझको देखु जी भर के,

पनघटों पे चाँदनी की हसीं छटा छाई हैं,
कान्हा और राधिका सी प्रीत उभर आई हैं,
दिल के सारे जज़्बात से,
लफ़्ज़ों के अल्फ़ाज़ से,
श्याम तेरी मुरलिया से रात आबाद हैं।
पुरा पुरा चाँद हैं, आज आसमान में,
आजा पिया तुझको देखु जी भर के,

Copyright देवर्षि मेहता “जुगनू”

किसी की अदाओ पे फिदा हो जाना (kisi ki adao pe fida ho jana)

किसी की अदाओ पे फिदा हो जाना,
इश्क़ करना यानी इश्क़ में फना हो जाना,

अपनी किस्मत तो यही लिख दी खुदा ने,
फिर कहाँ रोज का आना जाना।

हाथ दोनो तरफ से बढ़ने चाहिये,
तुम अपने हिस्से का तो निभाते जाना,

हमारे मिलने का सिलसिला तो मुसलसल चलता रहेगा,
फिर क्यों इन रस्मो रिवाजो से परे जाना,

अपनी हिम्मत का तू भरम रख ले “जुगनू”
फर्श से अर्श तक खुद को पहुँचा जाना।

© देवर्षि मेहता “जुगनू”

आसमां में नई उड़ान देखेगे ( Aasman Main Nae Udaan Dekhege )

आसमां में नई उड़ान देखेगे,
अब हम नया जहां देखेगे।

बढ़ चले हैं तरक्की की राह पर,
हर पल नया इम्तिहान देखेगे।

बुजुर्गो की सीख को साथ लेकर,
अपनी दुनिया का नया आयाम देखेगे।

कलाम साहब के सपनों को सच कर के,
दुनिया से अलग हिंदुस्तान देखेंगे।

कलाम साहब की पुण्यतिथि पर छोटी सी रचना

© देवर्षि मेहता”जुगनू “00g