किसी की अदाओ पे फिदा हो जाना (kisi ki adao pe fida ho jana)

किसी की अदाओ पे फिदा हो जाना,
इश्क़ करना यानी इश्क़ में फना हो जाना,

अपनी किस्मत तो यही लिख दी खुदा ने,
फिर कहाँ रोज का आना जाना।

हाथ दोनो तरफ से बढ़ने चाहिये,
तुम अपने हिस्से का तो निभाते जाना,

हमारे मिलने का सिलसिला तो मुसलसल चलता रहेगा,
फिर क्यों इन रस्मो रिवाजो से परे जाना,

अपनी हिम्मत का तू भरम रख ले “जुगनू”
फर्श से अर्श तक खुद को पहुँचा जाना।

© देवर्षि मेहता “जुगनू”

क्या होगा? (Kya hoga)

अब इससे बड़ा जलजला क्या होगा,
अपने बिछड़ जाने का सिलसिला क्या होगा।

आओ बेठो कुछ बात करु मैं तुमसे,
मैं अकेला ही चला तो काफिला क्या होगा।

जिसके संग सोचा ही नही था ज़िन्दगी का एक भी पल,
अगर वो बिछड़ भी गया तो गिला क्या होगा।

आबाद कर के तो गई हैं मुझको मोहब्बत तेरी,
समझ नही आता मुझे छोड़ के उसे मिला क्या होगा।

© मेहता देवर्षि ‘जुगनू’

 

आसमां में नई उड़ान देखेगे ( Aasman Main Nae Udaan Dekhege )

आसमां में नई उड़ान देखेगे,
अब हम नया जहां देखेगे।

बढ़ चले हैं तरक्की की राह पर,
हर पल नया इम्तिहान देखेगे।

बुजुर्गो की सीख को साथ लेकर,
अपनी दुनिया का नया आयाम देखेगे।

कलाम साहब के सपनों को सच कर के,
दुनिया से अलग हिंदुस्तान देखेंगे।

कलाम साहब की पुण्यतिथि पर छोटी सी रचना

© देवर्षि मेहता”जुगनू “00g

तुमको याद किया हैं मैंने (Tumko Yaad Kiya Hai Maine )

याद करो वो सावन के दिन,

याद करो एक दुझे के बिन,

एक पल नही चला करता था,

मावस हो या पूनम हर दिन,

जीवन नही कटा करता था,

अब इस क्षण विलक्षण तुम बिन,

तुमको बहुत जिया हैं मैंने,

जीवन के हर पल हर क्षण में,

तुमको याद किया हैं मैंने।

 

मेरी छोडो अपनी बतलाओ,

कुछ अपना संसार बताओ,

मुझसे अलग  रहकर  तुमने  क्या,

खुद अपना जीवन है  सवारा,

सांझ को मेरे गीत सुने क्या,

आंखों से क्या रुक गई धारा,

फिर भी आगे बढ़े हैं हम तुम,

बिना तुम्हारे व्यथित था ये मन,

इतना समय अब निकल चुका हैं,

रंग दिखाए कैसे रब ने,

जीवन के हर पल हर क्षण में,

तुमको याद किया हैं मैंने।

 

मुझको बस इतना बतलाओ,

क्या हैं ये जीवन समझाओ,

अभी भी रातों को जागना,

बिना वजह फिर राह ताकना,

अब भी क्या वो शब्द तुम्हारे,

जिनसे खत थे रोशन सारे,

इतना निकला इतना बिता,

जीवन तुम बिन ऐसे रीता,

हम दोनो में जो होता था,

हर संवाद जीया हैं मैंने,

जीवन के हर पल हर क्षण में,

तुमको याद किया हैं मैंने।

 

देख पूराना कागज़ खत का,

आंख मेरी भर आईं  हैं अब,

वही पुराना सपना अपना,

आंखों के घेरो में हैं अब,

उगल सका ना निगल सका में,

सृष्टि का था खेल अनोखा,

मानो एक दिन में लिख डाला,

मेरे जीवन का लेखा जोखा,

तेरे तन पर मन दर्पण पर,

कुछ आघात किया क्या मैंने,

जीवन के हर पल हर क्षण में,

तुमको याद किया हैं मैंने।

 

कुछ तो जीवन का सार मिले अब,

जीने का आधार मिले अब,

सहते सहते थका बढ़ा हूँ,

खुशियो का संसार मिले अब,

झझोड़े है मुझको अब तो,

मेरे मन की उन्मुक्त वेदना,

मालूम मुझको तो सब पड़ता है,

पर ना चाहे अब मन ये समझना,

जीना तो तुम बिन भी चाहा,

पर पक्षघात किया हैं रब ने,

जीवन के हर पल हर क्षण में,

तुमको याद किया है मैंने।

 

© देवर्षि मेहता “जुगनू”

कोई क्या चाहता हैं ( Koi Kya Chahta Hai )

जिन्दगी में कब कोई क्या चाहता हैं,
अगर रोता हैं बच्चा तो बस माँ चाहता हैं।

इबादत हैं उस खुदा से अगर समझे,
ये इंसां हैं जमीं का आसमां चाहता हैं।

रूबरू होउगा एक दिन उससे कुछ सवाल पूछने हैं,
क्या खेल हैं उसका वो क्या चाहता हैं।

ये तेरा घर हैं तेरा ही रहेगा “जुगनू”,
जाने वो कौन अनजान हैं जो तेरा पता चाहता हैं।

एक कतरा इश्क ही हैं जीने के लिए काफी,
अब इससे ज्यादा और कोई क्या चाहता हैं।

© मेहता देवर्षि “जुगनू”

तुझसे मोहब्बत हो गई

जिस तरह रब की इबादत हो गई,

उस तरह तुझसे मोहब्बत हो गई।

 

इश्क़ मेरा एक तरफ़ा न रहा,

मैं दीवाना तू दीवानी हो गई।

 

याद कर कर के मैं तुझको जी रहा हूँ,

अपनी ये आदत पुरानी हो गई ।

 

वक़्त भरता हैं सदी के सौ जख्म,

अब तो वो बातें पुरानी हो गई।

 

प्यार का वो रंग था ऐसा चढ़ा,

आसमानी आसमानी हो गई।

 

मंजिलों की अब तरफ मैं बढ़ रहा हूँ,

जीते मरते ज़िन्दगानी हो गई।

 

ख्वाहिशे तो थी मुझे भी तब बहुत,

तब की ठोकर अब सयानी हो गई।

 

बहुत तड़पा हैं तू अपनी ज़िन्दगी में,

“जुगनू” तेरी इक कहानी हो गई ।

©Devershi Mehta “Jugnu”